कोई व्यक्ति दूसरे के सुख या दुख का कारण नहीं बन सकता, सभी कर्मों का फल भोगते हैं: पं. शम्भुशरण लाटा
राम वनवास के प्रसंग पर पांडाल में हर श्रोता की आंखे नम हो गई
रामगढ़ शेखावाटी, 29 दिसम्बर। कोई व्यक्ति न तो किसी दूसरे के सुख का कारण बन सकता है और न ही दुख का। सभी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। कर्म चाहे इस जन्म के हो अथवा पूर्व जन्म के। यह कहना है पं. शम्भुशरण लाटा का जो आज गुरुवार को कस्बे के चूरू गेट के बाहर स्थित सप्तऋषि भवन आयोजित संगीतमय रामकथा के छठे दिन राम वनवास के प्रसंग पर हर व्यक्ति द्वारा कैकई को कोसने पर लक्ष्मण द्वारा उन्हें समझाये जाने की मार्मिक विवेचना कर रहे थे। आज की कथा के प्रारम्भिक भाग में जहां भगवान राम के राज्याभिषेक की तैयारियों को लेकर पूरे अयोध्या में खुशी और आनंद का माहौल रहता है वहीं दासी मंथरा द्वारा मतिभ्रमित करने पर कैकई राजा दशरथ से अपने वर के रूप में राम के चौदह वर्ष का वनवास व भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांगने पर पूरे अयोध्या में मातम सा छा जाता है। जहां कथा में अयोध्या का हर वासी राम के अयोध्या छोडऩे पर बिलख पड़ता है वहीं कथा सुनने वाले हर श्रोता की आंख भी नम हो जाती है। पं. लाटा ने राम, लक्ष्मण व सीता द्वारा अयोध्या छोडऩे का ऐसा चित्रण किया कि हर श्रोता को ऐसा लगा मानो भगवान राम उन्हें ही छोडक़र जा रहे हैं। पं. लाटा ने कहा कि कुछ लोगों का यह कहना पूर्ण रूप से असत्य है कि भारत में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं हैं, रामकथा के हर भाग में स्त्री को पुरुषों के न केवल बराबर अपितु पुरुषों से अधिक महत्व दिया गया है। उन्होंने कौशल्या द्वारा राम के कहे शब्दों के माध्यम से कहा कि यदि राम के पिता ने वनवास का आदेश दिया होता तो मैं उसे रोक देती लेकिन यह माता कैकई का आदेश है। अर्थात मां को पिता से भी बड़ा माना गया है। वनवास के प्रसंग में माता-पिता के प्रति अपार भक्ति का संदेश दिया गया है वहीं भाइयों के बीच स्नेह व पति-पत्नी के एक दूसरे के प्रति दायित्व की भी सुंदर विवेचना की गई। सुमंत द्वारा रथ में बैठाकर सीता-राम व लक्ष्मण को वन में ले जाने, अध्योध्या वासियों को पता चलने पर भारी पीड़ा की अनुभूति, सुमंत द्वारा वापिस अयोध्या लौटने का आग्रह करना, निषाद द्वारा वन की बजाय उनके ग्राम में ठहरने का आग्रह करना, केवट द्वारा बड़ी ही भक्ति और सूझबूझ के साथ भगवान राम के चरण धोना, गंगा पार करना, गंगा पार कराने के एवज में सीता द्वारा राम के मन की भावना समझते हुए मुद्रिका देना और केवट द्वारा इंकार करने आदि का सजीव चित्रण किया। पं. लाटा अपनी जन्मभूमि में बड़ी लगन और आत्मीयता से कथा कर रहे हैं वे स्वयं प्रसंगों में इतने खो जाते हैं कि आज की कथा में उन्होंने कई बार स्वीकार किया कि कथा के निर्धारित प्रसंगों में विलम्ब हो रहा है। उल्लेखनीय है कि कथा का आयोजन गुरुजी ठंडाईवाला परिवार के कोलकाता प्रवासी सीताराम शर्मा, इन्दौर प्रवासी राधेश्याम शर्मा व दिल्ली प्रवासी बालमुकुंद शर्मा द्वारा कराया जा रहा है। आज फिर सर्दी का कहर बढऩे, बादलों की आवाजाही और कभी-कभार होने वाली बूंदाबांदी भी श्रोताओं को नहीं रोक पाई। छठे दिन भी महिलाओं की अपार भीड़ देखने को मिली। कथा में कस्बे के अनेक गणमान्य नागरिक भी प्रतिदिन की भांति कथा का श्रवण कर भक्ति रस के सागर में गोता लगा रहे थे।
आज की सम्पूर्ण कथा यहां देखिए-
भजनों के माध्यम से संत रतिनाथ महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित की गई
रामगढ़ शेखावाटी, 29 दिसम्बर। कस्बे के प्रतापेश्वर महादेव मंदिर में बऊ धाम के पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन संत शिरोमणि रतिनाथ महाराज को सर्वसमाज के लोगों द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मंदिर परिसर में भजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बाद में उपस्थित जनों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। श्रद्धांजलि देने वालों में विप्र फाउंडेशन के नगर अध्यक्ष राकेश घुवाला बंटी, तहसील अध्यक्ष ताराचंद काछवाल, बनवारी लाल शर्मा, किशोर शर्मा, गोपाल सैनी, सीताराम दायमा, गजानंद शर्मा, भगवती नरेड़ा, रतनलाल पुजारी, पवन रूंथला, संजय सैनी, दिनेश व्यास, कमल चमडिय़ा व हरीश रूंथला सहित अनेक व्यक्ति उपस्थित थे।

