रेप के आरोपियों को 20 साल की जेल : कोर्ट ने कहा- पुलिस ने नाबालिग पीड़िता का नहीं करवाया मेडिकल, तत्कालीन SP पर कार्रवाई के आदेश

कल 3 जून को सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक बिना हेलमेट वाले दुपहिया वाहन चालकों के खिलाफ कार्यवाही की जायेगी

सीकर : पॉक्सो कोर्ट संख्या 2 ने 12 साल की नाबालिग से रेप के मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मामले में पीड़िता के धर्म के मामा और उसके जीजा को 20 साल के कठोर कारावास और 2.15 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई है। इसके अलावा तत्कालीन एसपी पर कठोर कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह विभाग को निर्देशित किया है। यह फैसला पोक्सो कोर्ट 2 के जज अशोक चौधरी ने सुनाया। मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से पैरवी लोक अभियोजक कैलाश दान कविया ने की।

दरअसल, मामले में नाबालिग लड़की के पिता ने रिपोर्ट दर्ज करवाई थी कि 29 मई 2018 की रात करीब 12 बजे बाद पीड़िता को उसकी मां का धर्म भाई जीतू घर से बहला-फुसला कर ले गया। जब सुबह 4 बजे के करीब नाबालिग की मां उठी तो उन्हें नाबालिग कमरे में नहीं मिली। घटना के बाद जीतू अपने घर पर भी नहीं गया। जब पीड़ित परिवार ने जीतू के मोबाइल नंबर पर बात की तो पीड़िता ने फोन उठाकर कहा कि उसे गोवा लेकर आए हैं। और बाद में मोबाइल भी स्विच ऑफ हो गया। इस पर रींगस पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

पीड़िता को मिलेंगे 2 लाख रुपए

मामले में पुलिस ने नाबालिग को दस्तयाब किया। उसने बयानों में बताया कि वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। जब वह रात को पेशाब करने के लिए उठी तो जीतू पीछे से आया और उसका मुंह बंद कर उसे कोटपुतली ले गया। जहां कोटपुतली में जीतू का जीजा राजेंद्र भी मौजूद था। दोनों उसे एक झोपड़ी में ले गए और वहां उसके साथ रेप किया। मामले में पुलिस ने दोनों आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू और राजेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर कोर्ट में चालान पेश किया। जिसके बाद आज दोनों आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू और राजेंद्र को 20 साल के कठोर कारावास और कुल 2.15 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है। जिसमें से 2 लाख रुपए पीड़िता को मिलेंगे। साथ ही पीड़िता को राजस्थान पीड़ित प्रतिकर स्कीम से उचित सहायता राशि दिलवाने का आदेश दिया है।

कोर्ट की टिप्पणी- मामले में पुलिस का नकारात्मक नजरिया रहा

मामले में कोर्ट ने टिप्पणी की है कि पीड़िता को दस्तयाब करने के बाद केवल इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बल्कि संबंधित थानाधिकारी की भी यह जिम्मेदारी होती है कि इस संबंध में महिलाओं के विरुद्ध पॉक्सो एक्ट जैसे मामलों में दस्तयाबी होने के समय से ही काउंसलिंग की जानी चाहिए और पीड़िता एवं परिजनों को सहयोग किया जाना चाहिए। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। इसके अलावा पुलिस ने बयान में पीड़िता के साथ रेप होने का उल्लेख किया है तो मेडिकल नहीं कराना संभवतः अभियोजन पक्ष की कमी को ही दर्शाता है। जब कोर्ट में पीड़िता ने अपने साथ गलत काम होने की बात कही तो उसकी काउंसलिंग करवाना आवश्यक थी। थाना स्तर पर रेप पीड़ितों की काउंसलिंग के लिए कोई सहायता उपलब्ध कराने का संसाधन होना ही प्रतीत नहीं होता है। ऐसी लापरवाही पुलिस अधीक्षक का जिले के विभागीय प्रभारी होते हुए ऐसे अपराधों के प्रति नकारात्मक नजरिया दर्शाता है। इससे न्याय व्यवस्था के चरमरा जाने का अंदेशा है। पीड़ितों का न्याय व्यवस्था से दूर रहने या व्यवस्था में अविश्वास की स्थिति निरंतर इसी कारण बन रही है। जिससे अपराधियों का हौसला बढ़ता जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय और राजस्थान हाई कोर्ट के द्वारा किए गए निर्णय की पालना में ही पुलिस अधिकारी अक्षम है।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक पर होगी कार्रवाई

आरोप पत्र पेश करने के समय अनुमति की फौरी औपचारिकता पुलिस अधीक्षक जैसे जिम्मेदार अधिकारी की बानगी बन गया है। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक का दृष्टिकोण नकारात्मक प्रवृत्ति का होना दृष्टिगत होता है।कोर्ट ने टिप्पणी कि है कि जिम्मेदारी तय करते हुए शीर्ष पुलिस अधिकारी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सीकर के विरुद्ध कठोर कार्रवाई किए जाने के लिए पुलिस महानिदेशक जयपुर और अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह विभाग जयपुर को निर्देशित किया जाता है।