Police Encounter: क्या होता है पुलिस एनकाउंटर और क्या हैं नियम? जानें जरूरी तथ्य
पुलिस या किसी अन्य सशस्त्र बल के साथ किसी गिरोह, अपराधी या आतंकवादी से हिंसक भिड़ंत हो जाने को एनकाउंटर शब्द दिया गया है। देश के कानून में एनकाउंटर जैसी किसी व्यवस्था का प्रावधान नहीं है। मगर, कुछ विशेष कानूनी परिस्थितियों में पुलिस अथवा सैन्य बलों को अपराधियों पर हमला करने की शक्तियां दी गयी हैं।
किस कानून के तहत पुलिस को मिलती है पावर?
एनकाउंटर को लेकर कोई नियम नहीं है। जाहिर है, जब संविधान में इसका जिक्र नहीं है, तो इससे जुड़ा कोई आधिकारिक नियम भी नहीं होगा। दरअसल, एनकाउंटर के ज्यादातर केस आईपीसी और सीआरपीसी की कुछ धाराओं के तहत होते हैं। ये धाराएं सेल्फ डिफेंस के अधिकार से जुड़ी हैं।
भारत में न केवल पुलिस, बल्कि भारत के प्रत्येक नागरिक को निजी रक्षा का अधिकार है। भारतीय दंड संहिता की धारा 96 और 100, निजी रक्षा का अधिकार प्रदान करती है। धारा 96 के अनुसार, यदि आत्मरक्षा में कोई कार्य किया जाता है, तो यह कोई अपराध नहीं है। मगर, यह भारतीय दंड संहिता की धारा 99 से संबंधित होना चाहिए, जो कहता है कि व्यक्ति आत्मरक्षा के उद्देश्य से आवश्यकता से अधिक नुकसान नहीं पहुंचाएगा। वहीं, धारा 100 के अनुसार, आत्मरक्षा का अधिकार किसी की हत्या तक विस्तृत हो सकता है। हालांकि, इस तरह की आत्मरक्षा के लिए कुछ स्थितियां भी तय की गई हैं, जिनके बारे में नीचे बताया गया है।
● आत्मरक्षा करने वाला व्यक्ति उस समय निर्दोष होना चाहिए।
● बचने के किसी सुरक्षित/उचित तरीके का अभाव होना चाहिए।
● आत्मरक्षा करने वाले व्यक्ति की मृत्यु या गंभीर शारीरिक चोट की आशंका होनी चाहिए।
● जान लेना ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए।
इसके अलावा आईपीसी की धारा 300(3) में प्रावधान है कि यदि कोई पब्लिक सर्वेंट न्याय के लिए काम करते हुए मौत की वजह बनता है और जो बिना किसी गलत इरादे के अपने कर्तव्य के निर्वाह के लिए वैध और अनिवार्य है, तो वह हत्या के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।
वहीं, सीआरपीसी की धारा 46(2) में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता है, तो गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति को उसे गिरफ्तार करने के लिए आवश्यक बल का उपयोग करने की पावर है।
गिरफ्तारी के समय जघन्य अपराधों का आरोपी व्यक्ति, जिसमें सजा आजीवन कारावास या मृत्युदंड है, ऐसे मामलों में यदि वह व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता है, तो पुलिस उस आरोपी व्यक्ति को मार भी सकती है। इसमें जरूरी है कि ऐसा उसी स्थिति में होना चाहिए, जब पुलिस के पास उसे हिरासत में लेने का कोई दूसरा विकल्प न हो।
आमतौर पर पुलिस एनकाउंटर को इन्हीं धाराओं के तहत दिखाया जाता है। इसमें भी अधिकतर मामले सीआरपीसी की धारा 46 के तहत देखे जाते हैं।
क्या फेक एनकाउंटर भी होते हैं?
फेक एनकाउंटर होते हैं या नहीं, इस पर लंबी बहस है। जब भी किसी चर्चित मामले में एनकाउंटर होता है, तो उस पर सवाल उठते हैं। उत्तर प्रदेश में हाल में अतीक अहमद के बेटे असद के एनकाउंटर पर भी एक धड़े ने सवाल उठाया। आरोप लगाने वालों ने इसे प्लान किया गया एनकाउंटर, यानी फेक एनकाउंटर कहा।
ऐसे में कोई भी एनकाउंटर फेक है या उसकी जरूरत थी, यह निष्पक्ष जांच के बाद ही साफ हो सकता है। हालांकि, देश में ऐसे कई एनकाउंटर हुए, जिन्हें एक पक्ष फेक ठहराता रहा है। इनमें यूपी में हाल में हुआ असद एनकाउंटर, 2020 का विकास दुबे एनकाउंटर, 2019 का हैदराबाद एनकाउंटर, 2018 का भोपाल जेल एनकाउंटर, 2008 का बाटला हाउस केस, 2004 का वीरप्पन केस और मुंबई में 2006 का राम नारायण गुप्ता एनकाउंटर जैसे केस शामिल हैं।
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार पुलिस और लोक व्यवस्था (Law & Order) राज्य का विषय है। ऐसे में केंद्र सरकार इन मामलों में सिर्फ एडवाइजारी जारी कर सकती है। अगर किसी एनकाउंटर पर सवाल उठाये जाते हैं तो मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (पीएचआर) 1993 के तहत नियमों के उल्लंघन की जांच का प्रावधान हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस कार्यवाही के दौरान मौतों के मामलों की जांच के लिए कुछ दिशा-निर्देश जरुर जारी किये हैं। इसमें सबसे प्रमुख है कि पुलिस कार्यवाही के दौरान हुई प्रत्येक मौत की सूचना 48 घंटों के अन्दर आयोग की दी जानी होती है।
पुलिस एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन
पुलिस एनकाउंटर में मौत को लेकर की गई टिप्पणियों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में एक गाइडलाइन जारी की थी। इसमें 16 बिंदुओं का जिक्र किया गया है, जिनका पालन करना आवश्यक है।
● जब भी पुलिस को किसी आपराधिक गतिविधि की जानकारी मिलती है, तो उसे लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में दर्ज करना होगा। उस रिकॉर्ड से संदिग्ध की डिटेल का खुलासा नहीं होना चाहिए।
● अगर एनकाउंटर में किसी की जान चली जाती है, तो केस दर्ज किया जाना चाहिए और बिना किसी देरी के कोर्ट को इसकी सूचना दी जानी चाहिए।
● एक वरिष्ठ अधिकारी के मार्गदर्शन में एक स्वतंत्र सीआईडी टीम या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा जांच की जानी चाहिए। इसमें पीड़ितों की पहचान, बरामदगी और सबूतों को संरक्षित करना, घटना देखने वाले गवाहों की पहचान समेत कम से कम आठ पहलुओं के जांच की आवश्यकता होती है।
● मुठभेड़ के सभी मामलों की मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए और न्यायिक मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट सौंपी जानी चाहिए।
● राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या राज्य मानवाधिकार आयोग को परिस्थिति अनुसार बिना किसी देरी के घटना की सूचना दे दी जानी चाहिए।
● मुठभेड़ में घायल अपराधी या पीड़ित को मेडिकल हेल्प दी जाए। मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर बयान दर्ज करेंगे, जिसके साथ फिटनेस सर्टिफिकेट भी अटैच होना चाहिए।
● एफआईआर और सभी सबूतों को बिना किसी देरी के अदालत में भेजा जाना चाहिए।
● अभियुक्त अपराधी की मृत्यु के मामले में निकट संबंधी को तत्काल सूचित किया जाना चाहिए।
● डीजीपी को मुठभेड़ के दौरान मौत के मामलों का छमाही ब्यौरा एनएचआरसी (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) को पेश करना होगा।
● दोषी पाए जाने या फर्जी मुठभेड़ करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए और जांच पूरी होने तक उसे निलंबित किया जाए।
● पुलिस मुठभेड़ में मारे गए व्यक्ति के आश्रितों को सीआरपीसी की धारा 357-ए के अनुसार मुआवजा दिया जाना चाहिए।
● संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत संबंधित अधिकारी को जांच के लिए अपने हथियार जांच एजेंसी के पास सरेंडर करने होंगे।
● आरोपी पुलिस अधिकारी के परिवारों को कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए, उन्हें वकील या परामर्शदाता प्रदान किए जाने चाहिए।
● मुठभेड़ की घटना के तुरंत बाद संबंधित अधिकारियों को न तो बिना नंबर आए (आउट ऑफ टर्न) प्रमोशन दिया जाना चाहिए और न ही कोई वीरता पुरस्कार दिया जाना चाहिए।
● अगर पीड़ित के परिवार को लगता है कि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है, तो वह सत्र न्यायाधीश से शिकायत कर सकते हैं, जिसके बाद सत्र न्यायाधीश उसकी जांच करेंगे।
● अदालत ने कहा है कि इन आवश्यकताओं को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत घोषित कानून के रूप में मानते हुए पुलिस मुठभेड़ों में मौत और गंभीर चोट के सभी मामलों में सख्ती से देखा जाना चाहिए।
सबसे ज्यादा एनकाउंटर वाले राज्य/केंद्र शासित प्रदेश
सांसद वरुण गांधी ने लोकसभा में पुलिस एनकाउंटर से जुड़े कुछ सवाल पूछे थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 8 फरवरी 2022 को इसका जवाब देते हुए अपनी वेबसाइट पर इसकी जानकारी अपलोड की है। इसमें 1 जनवरी 2017 से 31 जनवरी 2022 के बीच पुलिस एनकाउंटर में मारे गए लोगों का डेटा है। गृह मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, इस दौरान देश में एनकाउंटर के 655 मामले दर्ज किये गये।
राज्यवार देखें तो सर्वाधिक मामले छत्तीसगढ़ से 191, फिर उत्तर प्रदेश से 117, असम से 50, झारखंड से 49, ओडिशा से 36, जम्मू और कश्मीर से 35 अपराधी, नक्सली और आतंकवादी पुलिस मुठभेड़ों में मारे गये। जबकि इसी अवधि में गोवा, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, लक्षदीप, पुदुच्चेरी और लद्दाख जैसे राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी पुलिस एनकाउंटर नहीं हुआ।
(लेखक - शीतल शर्मा)